Free Delivery!! Free Delivery !! Buy Any 2 Books Get Free Books at your home.

चंद्रयान 2: एक चर्चा By Yukti Publication

 चंद्रयान 2: लॉन्चिंग से लेकर अब तक की पूरी कहानी- 

चांद हमेशा से ही इंसान के लिए एक कौतूहल का विषय रहा है। इसे लेकर हमेशा से ही वैज्ञानिक और पूरी मानव जाति जिज्ञासु रही है। पृथ्वी के सबसे करीब और सबसे ठंडे इस ग्रह को पृथ्वी से बाहर जीवन के लिए काफी उपयुक्त माना जाता रहा है। यही वजह है कि अनेक देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां समय-समय पर चांद पर अपने यान भेजती रही हैं।
भारत भी इस कार्य में पीछे नहीं है। भारत ने अंतरिक्ष में लगातार नई उपलब्धियां हासिल की हैं। पहले चंद्रमिशन चंद्रयान-1 की सफलता के बाद ही चंद्रयान-2 की तैयारी शुरू हो गई थी। तमाम चुनौतियों को पार करता हुआ भारत आज अंतरिक्ष की दुनिया में काफी ऊंची छलांग लगाने के साथ ही वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। दुनिया के कई देश अपना-अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम भी चला रहे हैं। आइए जानते हैं दुनिया के शीर्ष 10 देशों के बारे में जिन्होंने अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज की है
अमेरिका: हालांकि ब्रह्मांड का अन्वेषण करने वाला यह पहला देश नहीं था लेकिन पृथ्वी से बाहर भेजे सबसे अधिक अंतरिक्ष मिशन का संख्या इनके नाम हैं। इनका पहला स्पेस फ्लाइट बुध कार्यक्रम के तहत रहा। दूसरा प्रोग्राम जेमिनी था जिसका जीवनकाल 6 साल था। सबसे लोकप्रिय स्पेस मिशन अपोलो रहा है।
रूस: रूस दुनिया का पहला देश था जिसने स्पेस मिशन शुरू किया था। वे कई मामलों में पहले रहे जिसमें अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल, सैटेलाइट लॉन्च, अंतरिक्ष और पृथ्वी का कक्षा में पहला पुरुष व महिला भेजना, अंतरिक्ष में पहला जानवर भेजना, मून इफेक्ट और स्पेस वॉक, रेस ओवर, चांद के तस्वीर, स्पेस स्टेशन और मानवरहित लुनार सॉफ्ट लैंडिंग शामिल है।
चीन: चीन का स्पेस प्रोग्राम देश के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन CNSA द्वारा निर्देशित होता है। चीन की उपलब्धियों ने उसे तीसरा देश बना दिया जिसने स्वतंत्र रूप से मानव को अंतरिक्ष भेजा था। अब उनके अपने तीसरे स्पेस फ्लाइट को लॉन्च करने की योजना है। CNSA का 2020 में अपना स्थाई स्पेस स्टेशन बनाने और मंगल ग्रह और चांद के अभियानों के अन्वेषण की योजना है।
फ्रांस: यूरोप की उनकी यूरोपिन स्पेस एजेंसी है जो कि ग्रह के बाहर प्राकृतिक घटनाओं के अन्वेषण के लिए समर्पित है। एजेंसी को 1975 में स्थापित किया गया था और अब यह फ्रांस में पेरिस शहर में है। फ्रांस के स्पेस प्रोग्राम में मानव अंतरिक्ष उड़ान और अन्य ग्रहों के लिए मानव रहित अन्वेषण मिशन शामिल है।


भारत:

प्राचीन समय से भारतीयों को रॉकेट विज्ञान के लिए पहचाना जाता है। इसरो की यात्रा भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक माने जाने वाले डॉ. विक्रम ए साराभाई की सूझबूझ से शुरू हुई। भारत ने कम लागत में स्पेस कमर्शियल में दक्षता हासिल की है। जिन देशों के सैटेलाइट्स को इसरो ने लॉन्च किया है, उनमें अमेरिका और इसराइली सैटेलाइट भी शामिल हैं, जो ये बता रहे हैं कि सैटेलाइट प्रक्षेपण के बाजार में भारत बड़ी तेजी से अपनी जगह बना रहा है। बीते कुछ सालों में भारत ने दुनिया के 21 देशों के 79 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया है, जिसमें गूगल और एयरबस जैसी बड़ी कंपनियों के सैटेलाइट शामिल रहे हैं।
यूनाइटेड किंगडम: यूके ने हाल ही में अपनी खुद की स्पेस एजेंसी की स्थापना की है। इसका उद्घाटन 2010 में किया गया था और अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए सरकार की नीति और बजट की जिम्मेदारी ले चुका है।
जापान: स्पेस फ्लाइट्स और मिशन के मामले में जापान एशिया के अग्रणी देशों में है। जापान के विभिन्न प्रयोजनों के लिए पास लेटेस्ट सैटेलाइट और रॉकेट हैं। वे मानवयुक्त अंतरिक्ष गतिविधियों और अन्य विज्ञान संबंधित मिशन कर चुका है।
दक्षिण कोरिया: जब स्पेस मिशन शुरू करने की बात आती है तो चीन और जापान के साथ दक्षिण कोरिया एशिया के अग्रणी देशों में हैं। इन्होंने अब तक तीन स्पेस फ्लाइट्स लॉन्च की है।
ईरान: ईरान साल 2005 से सैटेलाइट्स और स्पेस फ्लाइट्स लॉन्च कर रहा है। यह देश एशियन स्पेस रेस में सक्रिय है। इसका पहला लॉन्च संयुक्त रूप से इरानी-रूसी Sinah-1 प्रोजेक्ट था। इरान की दूसरी सैटेलाइट वास्तव में 2009 में कक्षा में स्थापित की गई थी।
इसराइल: इसराइल स्पेस एजेंसी देश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का हिस्सा है। यह एजेंसी देश के सभी रिसर्च प्रोग्राम को को-ऑर्डिनेट करती है और इसकी स्थापना 1983 में हुई थी।
रूसी अंतरिक्ष कार्यक्रम
रूस की अंतरिक्ष एजेंसी 2030 तक चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने के लिए तैयार हो रही है। इसकी तैयारी में रूसी संघीय अंतरिक्ष एजेंसी रोजकॉसमस ने '70s-era ग्रेविटी मशीनों का इस्तेमाल करते हुए चंद्रमा पर लैंडिंग का परीक्षण शुरू कर दिया है। सेलेन नामक अनूठी तकनीक ने अंतरिक्ष यात्रियों को चांद की सतह पर गुरुत्वाकर्षण को अनुकरण करने की अनुमति दी है। यह 1970 के दशक में आरएससी एनर्जी द्वारा परीक्षण करने के लिए बनाया गया था। इससे यह पता लगाया जाएगा कि कैसरोनेट कैसे रोवर वाहन से बाहर निकल सकते हैं।

1969 से शुरू हुआ था सफर
आर्मस्ट्रांग ने 20 जुलाई 1969 को धरती के उपग्रह चंद्रमा पर कदम रखा था। उस समय उन्होंने कहा था कि एक इंसान का यह छोटा कदम मानव जाति के लिए बड़ा कदम साबित होगा। आर्मस्ट्रांग के इस कदम से पहले सोवियत संघ और अमेरिका में अंतरिक्ष में सफलता को लेकर होड़ मची थी। तभी 15 सितंबर 1959 को तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव अमेरिका की ऐतिहासिक यात्रा पर वाशिंगटन पहुंचे थे। वहां उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर को एक गोलाकार तोहफा भेंट किया था।

यह तोहफा एक गोलाकार वस्तु थी, जिसमें सोवियत संघ का प्रतीक चिन्ह छपा हुआ था। यह लूना-2 के ऑनबोर्ड होने की नकल थी, जो एक दिन पहले ही चंद्रमा की सतह पर पहुंचने वाला पहला अंतरिक्षयान बना था। 1969 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के ओपोलो 11 के कामयाब होने और चंद्रमा पर पहले इंसान के उतरने से पहले भी रूस चंद्रमा पर पहुंचने की होड़ में दो बार अमेरिकियों को पीछे छोड़ चुका था।
लूना-2 तेज गति से टकराया था चांद से
यह अंतरिक्ष यान 12 सितंबर, 1959 को लांच किया गया था। सोवियत संघ के अधिकारियों ने गोपनीयता के बीच एक ऐसा काम किया था जिससे दुनिया को उनकी उपलब्धि के बारे में पता चला था। उन्होंने ब्रिटिश अंतरिक्ष यात्री बर्नाड लोवल से अपने इस अभियान की गोपनीय जानकारी शेयर की। लोवल ने इस मिशन की कामयाबी के बारे में दुनिया को बताया। उन्होंने अमेरिका को भी इस उपलब्धि के बारे में जानकारी दी जो पहले सोवियत संघ की उपलब्धि को मानने के लिए तैयार नहीं था।

लूना 2 यान चंद्रमा की सतह पर 14 सितंबर, 1959 की मध्य रात्रि के बाद करीब 12 हजार किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से टकराया था। यह मिशन शीतयुद्ध के दौरान एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ से ज्यादा साबित हुआ था। यूके स्पेस एजेंसी के ह्यूमन एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम मैनेजर के अनुसार इस अभियान से वैज्ञानिकों के चंद्रमा की सतह के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली थी।
लूना-10 ने जुटाई थी चांद की मिट्टी के बारे में जानकारी
लूना-10 यान भी सोवियत संघ की अमेरिका पर बढ़त थी। दरअसल, लूना 10 ने कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बातों का पता लगाया जिसमें चंद्रमा की मिट्टी के तत्व और वहां के पत्थरों के छोटे-छोटे कणों के बारे में जानकारी शामिल थी। पत्थरों के छोटे- छोटे कण स्पेस में तेजी से गतिमान रहते हैं। यह किसी भी अंतरिक्ष अभियान और चंद्रमा की सतह पर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए खतरा बन सकता था।

मशहूर अंतरिक्ष इतिहासकार कहते हैं कि सोवियत संघ यह सोचने लगा था कि 1961 में अंतरिक्ष में पहला यात्री भेजकर या फिर 1965 में पहला स्पेस वॉक करके उसने अंतरिक्ष की रेस जीत ली है। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि अमेरिका चंद्रमा की सतह पर अंतरिक्ष यात्री को उतारने में कामयाब होगा।


1968 में अमेरिका ने बनाई निर्णायक बढ़त

अमेरिका ने बढ़त तब बनाई जब अपोलो 8 अभियान के तहत उन्होंने 1968 में चंद्रमा पर मानव सहित अंतरिक्ष यान भेजा, जो उसकी कक्षा में जाकर सफलतापूर्वक लौट आया था। एक साल के अंदर ही, अपोलो-11 चंद्रमा की सतह पर उतरने में कामयाब रहा। सोवियत संघ के पास अपोलो 8 अभियान का कोई जवाब नहीं था, जबकि उससे पहले मानव सहित अंतरिक्ष यान भेजने के मामले में भी वे अमेरिका से आगे था। आखिर ऐसा कैसे हुआ, इस बारे में नासा के इतिहासकार कहते हैं कि सोवियत संघ चंद्रमा पर अभियान भेजने में तो कामयाब रहा था लेकिन मानव सहित यान भेजने के लिए जरूर विकास नहीं कर पाया।
जानिए चंद्रयान-2 की खास बातें
रूस और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा के बाद अब आते हैं भारत के चंद्रयान मिशन पर। दुनिया के सामने अपना लोहा मनवाने और अंतरिक्ष में लंबी छलांग लगाने के मकसद से सोमवार को दूसरे चंद्र मिशन 'चंद्रयान-2' का प्रक्षेपण हुआ। इसे बाहुबली नाम के सबसे ताकतवर रॉकेट जीएसएलवी-एमके तृतीय यान से भेजा गया।

'चंद्रयान-2' चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंच पाया है। इससे चांद के बारे में समझ सुधारने में मदद मिलेगी जिससे ऐसी नयी खोज होंगी जिनका भारत और पूरी मानवता को लाभ मिलेगा. तीन चरणों का 3,850 किलोग्राम वजनी यह अंतरिक्ष यान ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर के साथ यहां सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी) से सुबह दो बजकर 51 मिनट पर आकाश की ओर उड़ान भरेगा।
पहले चंद्र मिशन की सफलता के 11 साल बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भू-समकालिक प्रक्षेपण यान जीएसएलवी-एमके तृतीय से 978 करोड़ रुपये की लागत से बने 'चंद्रयान-2' का प्रक्षेपण हो चुका है।
'चंद्रयान-2' को चांद तक पहुंचने में 54 दिन लगेंगे। इसरो के अधिकारियों ने बताया कि गत सप्ताह अभ्यास के बाद रविवार को इस मिशन के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई थी।
इसरो का सबसे जटिल और अब तक का सबसे प्रतिष्ठित मिशन माने जाने वाले 'चंद्रयान-2' के साथ भारत, रूस, अमेरिका और चीन के बाद चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने वाला चौथा देश बन गया।
तिरुमला में शनिवार को भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद इसरो के अध्यक्ष के सिवन ने बताया कि चंद्रयान-2 प्रौद्योगिकी में अगली छलांग है क्योंकि हम चांद के दक्षिणी ध्रुव के समीप सॉफ्ट लैंडिंग करने की कोशिश कर रहे हैं। सॉफ्ट लैंडिंग अत्यधिक जटिल होती है और हम तकरीबन 15 मिनट के खतरे का सामना करेंगे।'

  • स्वदेशी तकनीक से निर्मित चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं। आठ ऑर्बिटर में, तीन पेलोड लैंडर ‘विक्रम' और दो पेलोड रोवर ‘प्रज्ञान' में हैं। पांच पेलोड भारत के, तीन यूरोप, दो अमेरिका और एक बुल्गारिया के हैं।
  • चंद्रयान-2 के कुछ कलपुर्जे भुवनेश्वर के ‘सेंट्रल टूल रूम एंड ट्रेनिंग सेंटर' ने भी बनाए हैं। केंद्र सरकार द्वारा संचालित (सीटीटीसी) ने भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान मार्क तीन (थ्री) के क्रायोजेनिक इंजन में ईंधन प्रवेश कराने के लिए 22 प्रकार के वॉल्व तथा अन्य पुर्जे बनाए हैं।

हमारा पड़ोसी पाकिस्तान कहां है?

भारत के मुकाबले में पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम बहुत सीमित पैमाने पर है लेकिन भारत के चांद पर दोबारा पहुंचने के बाद उसे इस बारे में सोचना पड़ेगा। पहले से खराब अर्थव्यवस्था का शिकार पाकिस्तान क्या इस नई दौड़ के लिए क्या कुछ रकम जुटा पाएगा? पाकिस्तान के एक विश्लेषक का कहना था कि अंतरिक्ष मनुष्यों की साझी विरासत है और हर किसी की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी कोशिशों से बचें जिससे अंतरिक्ष में सरगर्मियां बढ़ें। पाकिस्तान ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम 1961 में शुरू किया था। इस कार्यक्रम के लिए पाकिस्तान स्पेस एंड अपर एटमॉस्फेयर रिसर्च कमीशन (सूपरको) की शुरुआत की गई जिसका आज भी नारा 'शांतिपूर्ण' मकसद के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान है।

'अवेंजर्स : एंडगेम' जितनी राशि में बना था चंद्रयान-2

चंद्रयान-2 के दौरान कुल 16 बड़ी बाधायें सामने आयीं जिसमें आखिरी क्षणों के 'सबसे भयावह' 15 मिनट भी शामिल थे।  इसके साथ ही चांद पर पहुंचने के लिए शुरू किया गया भारत का 48 दिवसीय मिशन पूरा हो गया लेकिन इसके जरिये कोई नया इतिहास नहीं रचा जा सका। हॉलीवुड की हालिया ब्लॉकबस्टर मूवी 'अवेंजर्स : एंडगेम' जितनी राशि में बनी थी, उससे तिहाई कम खर्च में इसरो ने चंद्र अभियान को अंजाम दिया। इस अभियान पर लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं जो अन्य देशों की ओर से संचालित ऐसे अभियान की तुलना में काफी कम है।

इसरो के लिए क्यों अहम है चंद्रयान-2 मिशन, पांच बड़े कारण

1. वैज्ञानिक क्षमता दिखाना - जब रूस ने मना किया तो ISRO वैज्ञानिकों ने खुद बनाया लैंडर-रोवर

नवंबर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि वह इस प्रोजेक्ट में साथ काम करेगा. वह इसरो को लैंडर देगा. 2008 में इस मिशन को सरकार से अनुमति मिली. 2009 में चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया गया. जनवरी 2013 में लॉन्चिंग तय थी, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर नहीं दे पाई. इसरो ने चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग मार्च 2018 तय की. लेकिन कुछ टेस्ट के लिए लॉन्चिंग को अप्रैल 2018 और फिर अक्टूबर 2018 तक टाला गया. इस बीच, जून 2018 में इसरो ने फैसला लिया कि कुछ बदलाव करके चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग जनवरी 2019 में की जाएगी. फिर लॉन्च डेट बढ़ाकर फरवरी 2019 किया गया. अप्रैल 2019 में भी लॉन्चिंग की खबर आई थी. इस मिशन की सफलता से यह साफ हो जाएगा कि हमारे वैज्ञानिक किसी के मोहताज नहीं हैं. वे कोई भी मिशन पूरा कर सकते हैं.

2. इसरो का छोटा सा कदम, भारत की छवि बनाने की लंबी छलांग

अपने दूसरे मून मिशन चंद्रयान-2 के साथ ISRO अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में हो सकता है कि छोटा कदम रख रहा हो, लेकिन यह भारत की छवि बनाने के लिए एक लंबी छलांग साबित हो सकती है. क्योंकि अभी तक दुनिया के तीन देश ही चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करा पाए हैं. ये देश हैं - अमेरिका, रूस और चीन. इसरो जब चांद पर चंद्रयान-2 को उतारेगा तब वह यह महारत हासिल करने वाला चौथा देश हो जाएगा.

 

3. कठिन जगह का चुनावः चांद पर जगह वह चुनी, जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है

इसरो के अनुसार चंद्रयान 2 चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है. इसका मकसद, चंद्रमा की जानकारी जुटाना है. ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा. इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव होंगे. ताकि भविष्य के चंद्र अभियानों की नई टेक्नोलॉजी को बनाने और उन्हें तय करने में मदद मिले.

 

4. सबसे ताकतवर रॉकेट GSLV Mk-III का उपयोग हो रहा है चंद्रयान-2 मिशन में

GSLV Mk-III भारत का अब तक का सबसे शक्तिशाली लॉन्चर है. इसे पूरी तरह से देश में ही बनाया गया है. तीन स्टेज का यह रॉकेट 4 हजार किलो के उपग्रह को 35,786 किमी से लेकर 42,164 किमी की ऊंचाई पर स्थित जियोसिनक्रोनस ऑर्बिट में पहुंचा सकता है. या फिर, 10 हजार किलो के उपग्रह को 160 से 2000 किमी की लो अर्थ ऑर्बिट में पंहुचा सकता है. इस रॉकेट के जरिए 5 जून 2017 को जीसेट-19 और 14 नवंबर 2018 को जीसेट-29 का सफल प्रक्षेपण किया जा चुका है.

5. चांद पर इसरो का चंद्रयान-2 ऐसा क्या खोजेगा जो दुनिया को हैरान कर दे

चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम जहां उतरेगा उसी जगह पर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते है या नहीं. वहां थर्मल और लूनर डेनसिटी कितनी है. रोवर चांद के सतह की रासायनिक जांच करेगा. तापमान और वातावरण में आद्रता (Humidity) है कि नहीं. चंद्रमा की सतह पर पानी होने के सबूत तो चंद्रयान 1 ने खोज लिए थे लेकिन चंद्रयान 2 से यह पता लगाया जा सकेगा कि चांद की सतह और उपसतह के कितने भाग में पानी है.

22 जुलाई से लेकर 13 अगस्त 2019 तक

चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान 22 जुलाई 2019 से लेकर 13 अगस्त 2019 तक पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाया. अर्थात 23 दिन तक चंद्रयान-2 पृथ्वी की अलग-अलग कक्षाओं में परिक्रमा करता रहा.

13 अगस्त से 19 अगस्त 2019 तक

चंद्रयान-2 इसके बाद 13 अगस्त से 19 अगस्त 2019 तक चांद की तरफ जाने वाली लंबी कक्षा में यात्रा किया. चंद्रयान-2 को 14 अगस्त 2019 को लूनर ट्रांसफर ट्रेजेक्टरी पर भेजा गया था.

20 अगस्त 2019 को चंद्रयान-2

इसरो ने 20 अगस्त 2019 को चंद्रयान-2 को चांद की पहली कक्षा में सफलतापूर्वक दाखिल करा दिया था. इसके साथ ही इसरो के नाम एक और बड़ी उपलब्धि हासिल हो गई थी.

21 अगस्त से 01 सितंबर

21 अगस्त से 01 सितंबर तक चंद्रयान-2 चंद्रमा की चार और कक्षाओं को पार किया था. अर्थात 28 अगस्त से 30 अगस्त तथा फिर 1 सितंबर को चंद्रयान-2 चौथी कक्षा को पार किया. उस समय चांद से उसकी दूरी 18 हजार किलोमीटर से घटकर मात्र 100 किलोमीटर हो गई थी.

02 सितंबर

02 सितंबर 2019 को चंद्रयान-2 मिशन लैंडर ऑर्बिटर से अलग हो गया था. विक्रम लैंडर अपने अंदर मौजूद प्रज्ञान रोवर को लेकर चांद की ओर बढ़ना शुरू किया था.

03 सितंबर

इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा 03 सितंबर 2019 को विक्रम लैंडर की पूरी तरह से जांच किया गया. इसरो के वैज्ञानिकों ने इसके लिए 3 सेकंड के लिए उसका इंजन ऑन किये थे तथा उसकी कक्षा में मामूली बदलाव किये.

04 सितंबर

इसरो वैज्ञानिक विक्रम लैंडर को 04 सितंबर को चांद के सबसे नजदीकी कक्षा में पहुंचाया था. इस कक्षा की एपोजी (चांद से कम दूरी) 35 किमी और पेरीजी (चांद से ज्यादा दूरी) 97 किमी थी.

07 सितंबर

चंद्रयान-2 के अंतिम चरण में भारत के मून लैंडर विक्रम से उस समय संपर्क टूट गया था जब वह चंद्रमा की सतह की ओर बढ़ रहा था. इसरो के अनुसार, रात 1:37 बजे लैंडर की चांद पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की प्रक्रिया शुरू हो गई थी. लेकिन लगभग 2.1 किमी ऊपर संपर्क टूट गया था. इसरो के अध्यक्ष के. सिवन ने कहा की डेटा की समीक्षा की जा रही है.

इजरायल के यान के साथ भी ऐसी ही दिक्कत आई थी

इजराइल की निजी कंपनी स्पेसएल ने अप्रैल 2019 में अपना मून मिशन भेजा था. लेकिन इजराइल का यान बेरेशीट चंद्रमा की सतह पर उतरने के दौरान क्रैश हो गया था. इस यान के इंजन में कुछ तकनीकी दिक्कत आने के बाद उसका ब्रेकिंग सिस्टम फेल हो गया था. वे चंद्रमा की सतह से लगभग 10 किलोमीटर दूर था. तभी उसी समय पृथ्वी से उसका संपर्क टूट गया और रोवर चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था.

पहली बार दक्षिणी ध्रुव पर उतरने की कोशिश

इसरो के वैज्ञानिकों ने पहले ही बताया था कि लैंडिंग के आखिरी पंद्रह मिनट सबसे जटिल होंगे. बहुत तेज गति से चल रहे ‘विक्रम’ को चांद की सतह तक सफलतापूर्वक उतारना बहुत बड़ी चुनौती थी. ‘विक्रम’ ने अंतिम समय में अपनी दिशा बदल दी, जिसके बाद उससे संपर्क टूट गया. आपको बता दे कि दक्षिणी ध्रुव पर आज तक कोई भी देश लैंड नहीं कर सका है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा की जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं

इसरो के वैज्ञानिकों ने लगभग 2:07 बजे बताया कि संपर्क बहाल करने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, इसरो प्रमुख के सिवन ने 2.18 बजे बताया की ‘विक्रम’ से संपर्क टूट गया है. हम आंकड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने के. सिवन और उनकी टीम का हौसला बढ़ाते हुए कहा की जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं.

ऑर्बिटरः चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चांद से 100 किमी ऊपर स्थापित किया गया. ऑर्बिटर' में आठ पेलोड, तीन लैंडर और दो रोवर है. यह चक्कर लगाते हुए लैंडर और रोवर से प्राप्त जानकारी को इसरो सेंटर पर भेजेगा.

लैंडर (विक्रम): लैंडर विक्रम में 4 पेलोड हैं. यह लैंडर 15 दिनों तक वैज्ञानिक प्रयोग में रहेगा. इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, अहमदाबाद ने इसकी सबसे शुरुआत की डिजाइन बनाया था. इसे बाद में बेंगलुरु के यूआरएससी ने विकसित किया था. लैंडर का नाम इसरो के संस्थापक और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है.

रोवर (प्रज्ञान): यह एक रोबोट है. इसका वजन 27 किलोग्राम है. इस रोबोट पर ही पूरे मिशन की जिम्मदारी है. इसमें दो पेलोड हैं. चांद की सतह पर यह करीब 400 मीटर की दूरी तय करेगा. यह इस दौरान विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग करेगा.

*date are taken from web