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Shree Ram Mandir Faisla | 9th November 2019 Current affairs

Ram Mandir faisla

 

Shree Ram Mandir Faisla | 9th November 2019 Current affairs of Shree Ram Mandir Decision

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर रामलला का हक मानाकोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफअयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए दी जाएगी जमीन
अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है. देश की सबसे बड़ी अदालत ने सबसे बड़े फैसले में अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक माना है. जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की विशेष बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया है.

शनिवार सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर पहुंचे. पांच जजों ने लिफाफे में बंद फैसले की कॉपी पर दस्तखत किए और इसके बाद जस्टिस गोगोई ने फैसला पढ़ना शुरू किया.

खाली जमीन पर नहीं बनाई गई थी मस्जिद

फैसले में ASI (भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण) का हवाला देते हुए कहा गया कि बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी खाली जगह पर नहीं किया गया था. विवादित जमीन के नीचे एक ढांचा था और यह इस्लामिक ढांचा नहीं था. कोर्ट ने कहा कि पुरातत्व विभाग की खोज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

हालांकि, कोर्ट ने ASI रिपोर्ट के आधार पर अपने फैसले में ये भी कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की भी पुख्ता जानकारी नहीं है. लेकिन इससे आगे कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष विवादित जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा है.


वहीं, कोर्ट ने 6 दिसंबर 1992 को गिराए गए ढांचे पर कहा कि मस्जिद को गिराना कानून का उल्लंघन था. ये तमाम बातें कहने के बाद कोर्ट ने विवादित जमीन पर रामलला का हक बताया. हालांकि, कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के दावों को खारिज कर दिया.

निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज

निर्मोही अखाड़े की लिखित दलील में कहा गया था कि विवादित भूमि का आंतरिक और बाहरी अहाता भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में मान्य है. हम रामलला के सेवायत हैं और ये हमारे अधिकार में सदियों से रहा है. निर्मोही अखाड़े ने अपनी दलील में कहा था कि हमें ही रामलला के मंदिर के पुनर्निर्माण, रखरखाव और सेवा का अधिकार मिलना चाहिए. अखाड़े के इस दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया और विवादित जमीन पर मंदिर निर्माण के लिए अलग से ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया.

वहीं, शिया वक्फ बोर्ड का दावा भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. शिया वक्फ बोर्ड ने कहा था कि मस्जिद मीर बाकी ने बनवाई थी, जो एक शिया थे, ऐसे में यह मस्जिद सुन्नियों को नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड के इस दावे को भी खारिज कर दिया.

केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाने का आदेश

विवादित जमीन पर रामलला का हक बताते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का भी आदेश दिया. इस ट्रस्ट के पास ही मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी होगी. यानी अब राम मंदिर का निर्माण का रास्ता साफ हो गया है और इस पर अब आगे का काम केंद्र की मोदी सरकार को करना है.

मुस्लिम पक्ष को भी जमीन

कोर्ट ने विवादित जमीन पर पूरी तरह से रामलला का हक माना है, लेकिन मुस्लिम पक्ष को भी अयोध्या में जमीन देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही किसी उचित जगह मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जगह दी जाए.

इस तरह 40 दिनों की लगातार सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आ गया है, जिसमें दशकों पुराने विवाद का खात्मा हो गया है और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है.

क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट से पहले इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2010 में अपना फैसला सुनाया था. 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन का बंटवारा कर दिया गया था. कोर्ट ने यह जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच जमीन बराबर बांटने का आदेश दिया था. हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसपर लंबी सुनवाई के बाद शनिवार (9 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और विवादित जमीन रामलला को देने का आदेश दिया.

 

नई दिल्ली. 134 साल पुराने अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद पर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। इसके तहत अयोध्या की 2.77 एकड़ की पूरी विवादित राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बने और इसकी योजना तैयार की जाए। चीफ जस्टिस ने मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दिए जाने का फैसला सुनाया, जो कि विवादित जमीन की करीब दोगुना है। चीफ जस्टिस ने कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है।

 


6 अगस्त से 16 अक्टूबर तक इस मामले पर 40 दिन सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। संविधान पीठ द्वारा शनिवार को 45 मिनट तक पढ़े गए 1045 पन्नों के फैसले ने देश के इतिहास के सबसे अहम और एक सदी से ज्यादा पुराने विवाद का अंत कर दिया। चीफ जस्टिस गोगोई, जस्टिस एसए बोबोडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने स्पष्ट किया कि मस्जिद को अहम स्थान पर ही बनाया जाए। रामलला विराजमान को दी गई विवादित जमीन का स्वामित्व केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा।

फैसले के मुख्य बिंदु

रामलला विराजमान/मंदिर

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा- राम जन्मभूमि स्थान न्यायिक व्यक्ति नहीं है, जबकि भगवान राम न्यायिक व्यक्ति हो सकते हैं। ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है, हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला विराजमान को दी जाए। इसका स्वामित्व केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा। 3 महीने के भीतर ट्रस्ट का गठन कर मंदिर िनर्माण की योजना बनाई जाए।

सुन्नी वक्फ बोर्ड

अदालत ने कहा- उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड विवादित जमीन पर अपना दावा साबित करने में विफल रहा। मस्जिद में इबादत में व्यवधान के बावजूद साक्ष्य यह बताते हैं कि प्रार्थना पूरी तरह से कभी बंद नहीं हुई। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया, जो यह दर्शाता हो कि वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे।

बाबरी मस्जिद

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- "मीर बकी ने बाबरी मस्जिद बनवाई। धर्मशास्त्र में प्रवेश करना अदालत के लिए उचित नहीं होगा। बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनाई गई थी। मस्जिद के नीचे जो ढांचा था, वह इस्लामिक ढांचा नहीं था।"

बाबरी विध्वंस

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एकदम स्पष्ट है कि 16वीं शताब्दी का तीन गुंबदों वाला ढांचा हिंदू कारसेवकों ने ढहाया था, जो वहां राम मंदिर बनाना चाहते थे। यह ऐसी गलती थी, जिसे सुधारा जाना चाहिए था।

नई मस्जिद

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अदालत अगर उन मुस्लिमों के दावे को नजरंदाज कर देती है, जिन्हें मस्जिद के ढांचे से पृथक कर दिया गया तो न्याय की जीत नहीं होगी। इसे कानून के हिसाब से चलने के लिए प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्ष देश में लागू नहीं किया जा सकता। गलती को सुधारने के लिए केंद्र पवित्र अयोध्या की अहम जगह पर मस्जिद के निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन दे।

धर्म और आस्था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "अदालत को धर्म और श्रद्धालुओं की आस्था को स्वीकार करना चाहिए। अदालत को संतुलन बनाए रखना चाहिए। हिंदू इस स्थान को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं। मुस्लिम भी विवादित जगह के बारे में यही कहते हैं। प्राचीन यात्रियों द्वारा लिखी किताबें और प्राचीन ग्रंथ दर्शाते हैं कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि रही है। ऐतिहासिक उद्धहरणों से संकेत मिलते हैं कि हिंदुओं की आस्था में अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि रही है।"

एएसआई की रिपोर्ट

पीठ ने कहा, "मस्जिद के नीचे जो ढांचा था, वह इस्लामिक ढांचा नहीं था। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इस तथ्य की पुष्टि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) कर चुका है। पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना एएसआई का अपमान होगा। हालांकि, एएसआई ने यह तथ्य स्थापित नहीं किया कि मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाई गई।'

निर्णय के संकेतक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "सीता रसोई, राम चबूतरा और भंडार गृह की मौजूदगी इस स्थान की धार्मिक वास्तविकता के सबूत हैं। हालांकि, आस्था और विश्वास के आधार पर मालिकाना हक तय नहीं किया जा सकता है। यह केवल विवाद के निपटारे के संकेतक।"

सरकारी रिकॉर्ड

पीठ ने कहा- विवादित जमीन रेवेन्यू रिकॉर्ड में सरकारी जमीन के तौर पर चिह्नित थी। यह सबूत मिले हैं कि राम चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू 1857 से पहले भी यहां पूजा करते थे, जब यह ब्रिटिश शासित अवध प्रांत था। रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्य बताते हैं कि विवादित जमीन का बाहरी हिस्सा हिंदुओं के अधीन था।

निर्मोही अखाड़ा

संविधान पीठ ने जन्मभूमि के प्रबंधन का अधिकार मांगने की निर्मोही अखाड़ा की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र से कहा कि मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को किसी तरह का प्रतिनिधित्व दिया जाए।

शिया वक्फ बोर्ड

1946 के फैजाबाद कोर्ट के आदेश को चुनौती देती शिया वक्फ बोर्ड की विशेष अनुमति याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया। शिया वक्फ बोर्ड का दावा विवादित ढांचे पर था। इसी को खारिज किया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को 3 हिस्सों में बांटने के लिए कहा था

2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाए। एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा रामलला विराजमान को मिले। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गई थीं।

new Delhi. The Supreme Court gave its verdict on the 134-year-old Ayodhya temple-mosque dispute on Saturday. A five-member constitution bench headed by Chief Justice Ranjan Gogoi unanimously ruled. Under this, the entire disputed Ram temple of Ayodhya was given for construction. The apex court said that a trust should be formed in 3 months for the construction of the temple and its plan should be prepared. The Chief Justice ruled that the Muslim side should be given 5 acres of alternative land to build the mosque, which is almost double the disputed land. The Chief Justice said that the demolished structure is the birthplace of Lord Rama and this belief of Hindus is unquestioned.

 

After a 40-day hearing on the matter from August 6 to October 16, the Supreme Court reserved its decision. The 1045-page decision read by the constitution bench for 45 minutes on Saturday put an end to the most important and more than a century-old controversy in the country's history. A bench of Chief Justice Gogoi, Justice SA Bobode, Justice DY Chandrachud, Justice Ashok Bhushan, Justice S Abdul Nazir made it clear that the mosque should be built at a prominent place. The disputed land given to Ramlala Virajaman will be owned by the receiver of the central government.

 

Key points of decision

 

Ramlala temple / temple

Chief Justice Ranjan Gogoi said - Ram Janmabhoomi is not a judicial person, whereas Lord Ram can be a judicial person. The demolished structure is the birthplace of Lord Rama, this belief of Hindus is unquestioned. The disputed 2.77 acres of land should be given to Ramlala Virajman. It will be owned by the central government receiver. Temple construction should be planned within 3 months by building a trust.

 

Sunni Waqf Board

The court said- the Uttar Pradesh Sunni Waqf Board failed to prove its claim on the disputed land. Despite the disruption of the prayer in the mosque, evidence suggests that the prayer never completely stopped. Muslims did not present any evidence indicating that they had full authority over the mosque before 1857.

 

Babri Masjid

The Supreme Court said- "Mir Baki built the Babri Masjid. It would not be proper for the court to enter theology. The Babri Masjid was not built on vacant land. The structure under the mosque was not an Islamic structure."

 

Babri demolition

The Supreme Court said that it is quite clear that the 16th-century three-domed structure was demolished by Hindu kar sevaks who wanted to build a Ram temple there. This was a mistake that should have been rectified.

 

New mosque

The Supreme Court said - if the court ignores the claim of those Muslims who have been separated from the structure of the mosque, justice will not prevail. It cannot be implemented in a secular country committed to live by law. To rectify the mistake, the Center gave 5 acres of land for the construction of a mosque at the important place of holy Ayodhya.

 

Religion and faith

The Supreme Court said, "The court should accept the faith of religion and devotees. The court should maintain a balance. Hindus consider this place to be the birthplace of Lord Rama. Muslims also say this about the disputed place. By ancient travelers Written books and ancient texts show that Ayodhya has been the birthplace of Lord Rama. Historical quotations indicate that the Hindu hopes Ayodhya has been the birthplace of Lord Rama.

 

ASI report

The bench said, "The structure under the mosque was not an Islamic structure. There was a temple under the demolished structure, this fact has been confirmed by the Archaeological Survey of India (ASI). The archaeological evidence is just an opinion. Dena would be an insult to the ASI. However, the ASI did not establish the fact that the temple was demolished and built a mosque. "

 

Decision indicators

The Supreme Court stated, "The presence of Sita Rasoi, Ram Chabutara and Bhandar Griha is evidence of the religious reality of the place. However, ownership cannot be decided on the basis of faith and belief. It is only indicative of settlement of the dispute. "

 

Official record

The bench said - the disputed land was marked as government land in the revenue records. Evidence has been found that Hindus at Ram Chabutara and Sita Rasoo worshiped here even before 1857, when it was the British-ruled Awadh province. Evidence recorded in the record suggests that the exterior of the disputed land was under the control of the Hindus.

 

Nirmohi Arena

The Constitution Bench rejected the Nirmohi Akhada's plea seeking the right to manage the birthplace. However, the court asked the Center to give some form of representation to the Nirmohi Akhara in the trust built for the temple construction.

 

Shia Waqf Board

The Supreme Court rejected the Shia Waqf Board's special permission petition challenging the 1946 Faizabad court order. The Shia Waqf Board's claim was over the disputed structure. This was rejected.

 

Allahabad High Court had asked to divide the disputed land into 3 parts.

In 2010, the Allahabad High Court had said that the 2.77-acre area of ​​Ayodhya should be divided equally into three parts. One part will be given to the Sunni Waqf Board, the other to the Nirmohi Arena and the third to Ramlala Virajaman. 14 petitions were filed in the Supreme Court against the High Court's decision.

 

 

अयोध्या विवाद: 1526 से अब तक 

 

1526 : इतिहासकारों के मुताबिक, बाबर इब्राहिम लोदी से जंग लड़ने 1526 में भारत आया था। बाबर के सूबेदार मीरबाकी ने 1528 में अयोध्या में मस्जिद बनवाई। बाबर के सम्मान में इसे बाबरी मस्जिद नाम दिया गया। 

1853 : अवध के नवाब वाजिद अली शाह के समय पहली बार अयोध्या में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की। हिंदू समुदाय ने कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई।

1949 : विवादित स्थल पर सेंट्रल डोम के नीचे रामलला की मूर्ति स्थापित की गई।

1950 : हिंदू महासभा के वकील गोपाल विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में अर्जी दाखिल कर रामलला की मूर्ति की पूजा का अधिकार देने की मांग की।

1959 : निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल पर मालिकाना हक जताया।

1961 : सुन्नी वक्फ बोर्ड (सेंट्रल) ने मूर्ति स्थापित किए जाने के खिलाफ कोर्ट में अर्जी लगाई और मस्जिद व आसपास की जमीन पर अपना हक जताया।

1981 : उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने जमीन के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1885 : फैजाबाद की जिला अदालत ने राम चबूतरे पर छतरी लगाने की महंत रघुबीर दास की अर्जी ठुकराई।

1989 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रखने को कहा।

1992 : अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा दिया गया।

2002 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित ढांचे वाली जमीन के मालिकाना हक को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की।

2010 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2:1 से फैसला दिया और विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बराबर बांट दिया।

2011 : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई।

2016 : सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की इजाजत मांगी।

2018 : सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद को लेकर दाखिल विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की।

6 अगस्त 2019 : सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर हिंदू और मुस्लिम पक्ष की अपीलों पर सुनवाई शुरू की।

16 अक्टूबर 2019 : सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई पूरी हुई।

 

Ayodhya dispute: from 1526 till now

 

1526: According to historians, Babur came to India in 1526 to fight Ibrahim Lodi. Babur's Subedar Mirbaki built a mosque in 1528 in Ayodhya. It was named Babri Masjid in honor of Babur.

1853: Communal violence erupted in Ayodhya for the first time during the Nawab of Awadh, Wajid Ali Shah. The Hindu community said that the mosque was built by breaking the temple.

1949: A statue of Ramlala is installed under the Central Dome at the disputed site.

1950: Hindu Mahasabha lawyer Gopal Visharad filed an application in Faizabad district court seeking the right to worship the idol of Ramlala.

1959: Nirmohi Akhara asserts ownership over the disputed site.

1961: The Sunni Waqf Board (Central) petitioned the court against the installation of the idol and asserted its right to the mosque and the surrounding land.

1981: Uttar Pradesh Sunni Central Waqf Board sues for land ownership.

1885: The district court of Faizabad rejected the application of Mahant Raghubir Das to put an umbrella on the Ram platform.

1989: Allahabad High Court asked to maintain status quo at disputed site.

1992: Disputed structure demolished in Ayodhya.

2002: Allahabad High Court begins hearing on petitions filed for the ownership of disputed structure land.

2010: The Allahabad High Court ruled 2: 1 and divided the disputed site equally between the Sunni Waqf Board, Nirmohi Akhara and Ramlala in three parts.

2011: The Supreme Court stayed the Allahabad High Court verdict.

2016: Subramanian Swamy filed an application in the Supreme Court seeking permission to build the Ram temple at the disputed site.

2018: Supreme Court begins hearing on various petitions filed regarding Ayodhya dispute.

August 6, 2019: The Constitution Bench of the Supreme Court begins hearing on appeals of the Hindu and Muslim side filed against the Allahabad High Court's decision.

16 October 2019: Hearing of the case completed in the Supreme Court.

 

इतिहासकारों के मुताबिक, बाबरी मस्जिद 1528 में बनी; 1813 में हिंदू संगठनों ने पहली बार इस जमीन पर अपना दावा किया

यह विवाद 1855 से ब्रिटिश अधिकारियों के रिकॉर्ड में मिलता है, 1885 में यह पहली बार कोर्ट में पहुंचा

फैजाबाद जिला अदालत में 102 साल, इलाहाबाद हाईकोर्ट में 23 साल और सुप्रीम कोर्ट में 9 साल पहले मामला पहुंचा

 

नई दिल्ली. हिंदू संगठनों ने 1813 में पहली बार बाबरी मस्जिद पर दावा किया था। उनका दावा है कि अयोध्या में राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। इसके 72 साल बाद यह मामला पहली बार किसी अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने 1885 में राम चबूतरे पर छतरी लगाने की याचिका लगाई थी, जिसे फैजाबाद की जिला अदालत ने ठुकरा दिया था। 134 साल से तीन अदालतों में इस विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

 

 

अयोध्या का शाब्दिक अर्थ अजेय है। अयोध्या पहले वैष्णव उपासना का केंद्र रही। पांचवीं शताब्दी में यहां गुप्त वंश का राज रहा। सातवीं शताब्दी में यह नगर निर्जन हो गया। अयोध्या का संबंध राम के आख्यान और सूर्यवंश से है।

 

कब बनी मस्जिद?

इतिहासकारों के इस पर अलग-अलग मत हैं। ज्यादातर इतिहासकारों के मुताबिक, जहीर उद-दीन मोहम्मद बाबर पानीपत के पहले युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर भारत आया था। उसके कहने पर एक सूबेदार मीर बाकी ने 1528 में अयोध्या में मस्जिद बनाई। इसे बाबरी मस्जिद नाम दिया गया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इब्राहिम लोदी के शासनकाल (1517-26 ईस्वी) में ही मस्जिद बन गई थी। इसे लेकर मस्जिद में एक शिलालेख भी था, जिसका जिक्र एक ब्रिटिश अफसर ए फ्यूहरर ने कई जगह किया है। फ्यूहरर के मुताबिक, 1889 तक यह शिलालेख बाबरी मस्जिद में था।

 

206 साल पहले विवाद सामने आया

1813 में पहली बार हिंदू संगठनों ने दावा किया कि बाबर ने 1528 में राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई। माना जाता है कि फैजाबाद के अंग्रेज अधिकारियों ने मस्जिद में हिंदू मंदिर जैसी कलाकृतियां मिलने का जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया, उसी के बाद यह दावा किया गया। पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने अपनी किताब ‘अयोध्या रीविजिटेड’ में इस वाकये का जिक्र करते हुए लिखा है कि 1813 में मस्जिद की शिलालेख के साथ जब छेड़छाड़ हुई, तब से यह कहा जाने लगा कि मीर बाकी ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई। कुणाल ने किताब में लिखा है कि मंदिर 1528 में नहीं तोड़ा गया, बल्कि औरंगजेब द्वारा नियुक्त फिदायी खान ने 1660 में उसे तोड़ा था।

 

1855-85 : कई अंग्रेज अफसरों के रिकॉर्ड में विवाद से जुड़ी कई शिकायतों का जिक्र

हिंदुओं के दावे के बाद से विवादित जमीन पर नमाज के साथ-साथ पूजा भी होने लगी। 1853 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के समय पहली बार अयोध्या में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की। इसके बाद भी 1855 तक दोनों पक्ष एक ही स्थान पर पूजा और नमाज अदा करते रहे। 1855 के बाद मुस्लिमों को मस्जिद में प्रवेश की इजाजत मिली, लेकिन हिंदुओं को अंदर जाने की मनाही थी। ऐसे में हिंदुओं ने मस्जिद के मुख्य गुम्बद से 150 फीट दूर बनाए राम चबूतरे पर पूजा शुरू की। 1859 में ब्रिटिश सरकार ने विवादित जगह पर तार की बाड़ लगवाई। 1855 से 1885 तक फैजाबाद के अंग्रेज अफसरों के रिकॉर्ड में मुस्लिमों द्वारा विवादित जमीन पर हिंदुओं की गतिविधियां बढ़ने की कई शिकायतें मिली हैं।

 

1885 से 1987 तक फैजाबाद जिला अदालत में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल हुईं

1885 : पहली बार मामले को न्यायालय में उठाया गया। फैजाबाद की जिला अदालत में महंत रघुबर दास ने राम चबूतरे पर छतरी लगाने की अर्जी लगाई, जिसे ठुकरा दिया गया।

1934 : अयोध्या में दंगे भड़के। बाबरी मस्जिद का कुछ हिस्सा तोड़ दिया गया। विवादित स्थल पर नमाज बंद हुई।

1949 : मुस्लिम पक्ष का दावा है कि बाबरी मस्जिद में केंद्रीय गुम्बद के नीचे हिंदुओं ने रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी। इसके 7 दिन बाद ही फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी मस्जिद को विवादित भूमि घोषित किया और इसके मुख्य दरवाजे पर ताला लगा दिया गया।

1950 : हिंदू महासभा के वकील गोपाल विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में अर्जी दाखिल कर रामलला की मूर्ति की पूजा का अधिकार देने की मांग की।

1959 : निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल पर मालिकाना हक जताया।

1961 : सुन्नी वक्फ बोर्ड (सेंट्रल) ने मूर्ति स्थापित किए जाने के खिलाफ कोर्ट में अर्जी लगाई और मस्जिद व आसपास की जमीन पर अपना हक जताया।

1986 : फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश दिया।

1987 : फैजाबाद जिला अदालत से पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दिया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में 23 साल सुनवाई के बाद आया फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1989 में विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रखने को कहा। इस बीच 1992 में हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर विवादित ढांचा ढहा दिया। इस मामले पर अलग से सुनवाई चल रही है। 10 साल बाद यानी 2002 से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित ढांचे वाली जमीन के मालिकाना हक को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की और 2010 में इस पर फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2:1 से फैसला दिया और विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बराबर बांट दिया।

 

सुप्रीम कोर्ट ने लगातार 40 दिन सुनवाई की

2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट में इस विवाद पर लगातार 40 दिन तक सुनवाई हुई। 16 अक्टूबर 2019 को हिंदू-मुस्लिम पक्ष की दलीलें सुनने के बाद पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

 

 

According to historians, the Babri Masjid was built in 1528; In 1813 Hindu organizations first claimed this land.

This dispute is found in the records of the British authorities since 1855, it reached the court for the first time in 1885.

The case reached in Faizabad district court 102 years, 23 years in Allahabad High Court and 9 years in Supreme Court.

 

new Delhi. Hindu organizations claimed the Babri Masjid for the first time in 1813. He claims that the Babri Masjid was built by breaking the Ram temple in Ayodhya. 72 years later, the case reached a court for the first time. In 1885, Mahant Raghubar Das petitioned to put an umbrella on the Ram Chaputra, which was turned down by the district court of Faizabad. The matter reached the Supreme Court after hearing the petitions related to the dispute in three courts for 134 years.

 

 

Ayodhya literally means invincible. Ayodhya was previously the center of Vaishnava worship. The Gupta dynasty ruled here in the fifth century. This city became uninhabited in the seventh century. Ayodhya is related to Ram's narrative and Suryavansh.

 

When was the mosque built?

Historians have different views on this. According to most historians, Zaheer ud-Din Mohammad Babur came to India after defeating Ibrahim Lodi in the first war of Panipat. At his instance, a Subedar Mir Baqi built a mosque in Ayodhya in 1528. It was named Babri Masjid. Some historians believe that the mosque was built during the reign of Ibrahim Lodi (1517–26 AD). There was also an inscription in the mosque, which has been mentioned by a British officer A Fuehrer in many places. According to the Führer, by 1889 this inscription was in the Babri Masjid.

 

The controversy arose 206 years ago.

For the first time in 1813 Hindu organizations claimed that Babur broke the Ram temple in 1528 and built a mosque. The British authorities of Faizabad are believed to have mentioned in their reports that artifacts like Hindu temples were found in the mosque, after which it was claimed. Former IPS officer Kishore Kunal has written in his book 'Ayodhya Revisited', referring to the incident that when the mosque's inscription was tampered with in 1813, it was said that Mir Baqi broke the temple and built the mosque. Kunal writes in the book that the temple was not demolished in 1528, but was broken in 1660 by Fidayi Khan, appointed by Aurangzeb.

 

1855-85: Many British officers record many complaints related to the dispute

Since the claim of the Hindus, prayers along with namaz started on the disputed land. Communal violence erupted in Ayodhya for the first time in 1853 under the Nawab of Awadh, Wajid Ali Shah. Even after this, till 1855, both sides continued to perform poojas and namaz at the same place. Muslims were allowed entry into the mosque after 1855, but Hindus were forbidden to enter. In this way, Hindus started worshiping on the Ram platform, built 150 feet away from the main dome of the mosque. In 1859, the British government erected a wire fence at the disputed site. From 1855 to 1885, records of British officers in Faizabad have received many complaints of increasing Hindu activities on disputed land by Muslims.

 

Separate petitions were filed in Faizabad district court from 1885 to 1987

1885: For the first time the matter is taken up in court. In the district court of Faizabad, Mahant Raghubar Das petitioned to put an umbrella on the Ram platform, which was turned down.

1934: Riots erupt in Ayodhya. Some part of the Babri Masjid was demolished. Namaz was closed at the disputed site.

1949: The Muslim side claims that Hindus installed a statue of Ramlala under the central dome in the Babri Masjid. 7 days later, the Faizabad court declared the Babri Masjid a disputed land and its main door was locked.

1950: Hindu Mahasabha lawyer Gopal Visharad filed an application in Faizabad district court seeking the right to worship the idol of Ramlala.

1959: Nirmohi Akhara asserts ownership over the disputed site.

1961: The Sunni Waqf Board (Central) petitioned the court against the installation of the idol and asserted its right to the mosque and the surrounding land.

1986: Faizabad court orders the opening of the lock of Babri Masjid.

1987: The entire case was transferred from Faizabad district court to Allahabad High Court.

The verdict came after 23 years of hearing in the Allahabad High Court

The Allahabad High Court asked in 1989 to maintain status quo at the disputed site. Meanwhile, in 1992, thousands of karsevaks reached Ayodhya and demolished the disputed structure. A separate hearing is going on in this case. After 10 years i.e. from 2002, the Allahabad High Court started hearing on the petitions filed for the ownership of the disputed structure land and ruled it in 2010. The Allahabad High Court ruled 2: 1 and divided the disputed site equally between the Sunni Waqf Board, Nirmohi Akhara and Ramlala in three parts.

 

Supreme Court held hearing for 40 consecutive days

After the Allahabad High Court stayed the judgment in 2011, the Supreme Court in 2018 started hearing all the petitions related to this dispute. From 6 August 2019, the dispute was heard in the Supreme Court for 40 consecutive days. On 16 October 2019, after hearing the arguments of the Hindu-Muslim side, the five-member Constitution Bench reserved its decision.

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